Wednesday, December 4, 2019

महाराजा हरिश्चन्द्र जीवनी - Biography of Maharaja Harishchandra in Hindi Jivani




सत्य की चर्चा जब भी कही जाएगी, महाराजा हरिश्चन्द्र का नाम जरुर लिया जायेगा. हरिश्चन्द्र इकक्षवाकू वंश के प्रसिद्ध राजा थे. कहा जाता है कि सपने में भी वे जो बात कह देते थे उसका पालन निश्चित रूप से करते थे | इनके राज्य में सर्वत्र सुख और शांति थी. इनकी पत्नी का नाम तारामती तथा पुत्र का नाम रोहिताश्व था. तारामती को कुछ लोग शैव्या भी कहते थे. Maharaja Harishchandra की सत्यवादिता और त्याग की सर्वत्र चर्चा थी. महर्षि विश्वामित्र ने हरिश्चन्द्र के सत्य की परीक्षा लेने का निश्चय किया.
        रोग से छुटकारा पाने और वरुणदेव को फिर प्रसन्न करने के लिए राजा वशिष्ठ जी के पास पहुँचे। इधर इंद्र ने रोहिताश्व को वन में भगा दिया। राजा ने वशिष्ठ जी की सम्मति से अजीगर्त नामक एक दरिद्र ब्राह्मण के बालक शुन:शेपको खरीदकर यज्ञ की तैयारी की। परंतु बलि देने के समय शमिता ने कहा कि मैं पशु की बलि देता हूँ, मनुष्य की नहीं। जब शमिता चला गया तो विश्वामित्र ने आकर शुन:शेप को एक मंत्र बतलाया और उसे जपने के लिए कहा। इस मंत्र का जप कने पर वरुणदेव स्वयं प्रकट हुए और बोले - हरिश्चंद्र , तुम्हारा यज्ञ पूरा हो गया। इस ब्राह्मणकुमार को छोड़ दो। तुम्हें मैं जलोदर से भी मुक्त करता हूँ
विभिन्न ग्रंथों में उल्लेख
मार्कण्डेय पुराण
राजा हरिश्चंद्र धार्मिकसत्यप्रिय तथा न्यायी थे। एक बार उन्होंने स्त्रियों का आर्त्तनाद सुना। वे रक्षा के लिए पुकार रही थीं। हरिश्चंद्र ने उनकी रक्षा के निमित्त पग पढ़ाया तो उसके हृदय में विघ्नराज (संपूर्ण कार्यों में बाधा स्वरूपने प्रवेश कियाक्योंकि वह आर्त्तनाद उन विधाओं का ही थाजिनका विश्वामित्र अध्ययन करते थे। मौन और आत्मसंयम से जिन विधाओं को वे पहले सिद्ध नहीं कर पाये थेवह नारी-रूप में उनके भय से पीड़ित होकर रो रही थीं। रुद्रकुमार विघ्नराज ने उनकी सहायता के निमित्त ही राजा के हृदय में प्रवेश किया था। हरिश्चंद्र ने अभिमानपूर्वक कहा—'वह कौन पापात्मा है जो हमारे राज्य में किसी को सता रहा है?' विश्वामित्र ने उसके अभिमान से रुष्ट होकर उससे पूछा—'दान किसे देना चाहिएकिसकी रक्षा करनी चाहिए और किससे युद्ध करना चाहिए?' राजा ने तीनों प्रश्नों के उत्तर क्रमशये दिये:
    ब्राह्मण अथवा आजीविका विहीन को,
    भयभीत प्राणी को
    शत्रु से।
विश्वामित्र ने ब्राह्मण होने के नाते राजा से उसका समस्त दानस्वरूप ले लिया। तदनंतर उसे उस राज्य की सीमाएं छोड़कर चले जाने को कहा और यह भी कहा कि एक माह के उपरांत हरिश्चंद्र उनके राजसूय यज्ञ के लिए दीक्षास्वरूप धन (दक्षिणाभी प्रदान करे। राजा अपनी पत्नी तारामती (शैव्यातथा पुत्र रोहिताश्व को साथ ले पैदल ही काशी की ओर चल दिया। तारामती धीरे-धीरे चल रही थीअतः क्रुद्ध मुनि ने उस पर डंडे से प्रहार किया। कालांतर में वे लोग काशी पहुंचे। वहां विश्वामित्र दक्षिणा लेने के निमित्त पहले से ही विद्यमान थे। कोई और मार्ग  देख राजा ने शैव्या और रोहिताश्व को एक ब्राह्मण के हाथों बेच दिया। दक्षिणा के लिए धन पर्याप्त  होने के कारण स्वयं चांडाल के हाथों बिक गया।
महाराजा हरिश्चन्द्र और तारामती
उन्होंने तारामती से कहाशमशान का कर तो तुम्हे देना ही होगाउससे कोई मुक्त नहीं हो सकताअगर मैं किसी को छोड़ दूँ तो यह अपने मालिक के प्रति विश्वासघात होगा.
उन्होंने तारामती से कहाअगर तुम्हारे पास और कुछ नहीं है तो अपनी साड़ी का आधा भाग फाड़ कर दे दोमैं उसे ही कर में ले लूँगा.
तारामती विवश थीउसने ज्यो ही साड़ी को फाड़ना आरम्भ कियाआकाश में गंभीर गर्जना हुईविश्वामित्र प्रकट हो गयेउन्होंने रोहिताश्व को भी जीवित कर दियाविश्वामित्र ने हरिश्चन्द्र को आशीर्वाद देते हुए कहातुम्हारी परीक्षा हो रही थी कि तुम किस सीमा तक सत्य एवं धर्म का पालन कर सकते होयह कहते हुए विश्वामित्र ने उन्हें उनका राज्य ज्यो का त्यों लौटा दिया.
महाराज हरिश्चन्द्र ने स्वयं को बेचकर भी सत्यव्रत का पालन कियायह सत्य एवं धर्म के पालन का एक बेमिसाल उदाहरण हैआज भी महाराजा हरिश्चन्द्र का नाम श्रद्धा और आदर के साथ लिया जाता है.
कथा
राजा हरिश्चन्द्र ने सत्य के मार्ग पर चलने के लिये अपनी पत्नी और पुत्र के साथ खुद को बेच दिया था। कहा जाता है-
    चन्द्र टरै सूरज टरैटरै जगत व्यवहारपै दृढ श्री हरिश्चन्द्र का टरै  सत्य विचार।
इनकी पत्नी का नाम तारा था और पुत्र का नाम रोहित। इन्होंने अपने दानी स्वभाव के कारण विश्वामित्र जी को अपने सम्पूर्ण राज्य को दान कर दिया थालेकिन दान के बाद की दक्षिणा के लिये साठ भर सोने में खुद तीनो प्राणी बिके थे और अपनी मर्यादा को निभाया थासर्प के काटने से जब इनके पुत्र की मृत्यु हो गयी तो पत्नी तारा अपने पुत्र को शमशान में अन्तिम क्रिया के लिये ले गयी। वहाँ पर राजा खुद एक डोम के यहाँ नौकरी कर रहे थे और शमशान का कर लेकर उस डोम को देते थे। उन्होने रानी से भी कर के लिये आदेश दियातभी रानी तारा ने अपनी साडी को फाड़कर कर चुकाना चाहाउसी समय आकाशवाणी हुयी और राजा की ली जाने वाली दान वाली परीक्षा तथा कर्तव्यों के प्रति जिम्मेदारी की जीत बतायी गयी

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